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ज्यादातर खबरों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि उनकी उम्र कुछ घंटों की ही होती है. लेकिन, फीचर के साथ ऐसा नहीं होता. जो चीज आज हम पब्लिश करते हैं, उसे अगर महीने भर बाद भी पढ़ा जाए तो वह वही मजा देती है. बीते तीन माह में हमें ऐसी बहुत सारी स्टोरीज मिली हैं, जो एवरग्रीन कैटेगरी में आती हैं. उन्हीं में से कुछ चुनिंदा स्टोरीज को हम यहाँ पब्लिश कर रहे हैं, ताकि आप भी जान सकें कि आपके खुद के शहर और आस-पास के इलाकों में कितना बड़ा खजाना है, ऐसी कंटेंट का…

सोनभद्र- चोपन स्थित ओम पहाड का अदभु दृश्‍य 

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by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

Writing the Picture

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By Suraj D. Telang from Pune (M.S.)

पंचमुखी मंदिर मार्कण्डेय ऋषि की तपोस्थली 

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सोनभद्र-  चुर्क के समीप सहजन कला गांव की पहाड़ी पर स्थित पंचमुखी मंदिर मार्कण्डेय ऋषि की तपोस्थली रही है। यह स्थल दक्षिण मध्य काशी के मध्य श्मशान तंत्रपीठ भी है मंदिर के पुजारी लक्ष्मण द्विवेदी बताते है कि पांच मुख के भगवान भोलेनाथ स्वयंभू है।और उनकी माने तो मूर्ति की स्थापना नहीं की गई थी। द्वापर युग में पांडवों को वनवास होने पर अर्जुन द्वारा यहीं पर भगवान शिव की तपस्या की गयी थी। यहीं पर भगवान भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर अर्जुन को पशुपत अस्त्र प्रदान किया था। पंचमुखी भगवान शिव मंदिर में मूर्ति की स्थापना नहीं की गई थी। यहां पर भगवान का शिवलिंग स्वयं जमीन से निकला है। इसलिए इसे स्वयंभू कहते है। जमीन के अंदर से शिवलिंग के प्रकट होने के कारण लोग इसे चमत्कार मानते है।

चंद्रकांता के अमर प्रेम  का प्रतीक विजयगढ़ दुर्ग 

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सोनभद्र-जिला मुख्यालय रावर्टसगंज से करीब 25 किमी दूर स्थित विजयगढ़ दुर्ग चंद्रकांता की अमर प्रेम कहानी का प्रतीक है। नौगढ़ के युवराज संग उसकी प्रेम कहानी को लेकर बना टीवी सीरियल चंद्रकांता प्रसारित हुआ था, जो काफी सराहा गया। लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के कारण यह स्थल अवशेष मात्र रह गया है। सरकारों ने इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले दिनों में यह तिलिस्मी किला महज इतिहास बनकर रह जाएगा। इसकी पहचान सिर्फ मीरान शाह बाबा की मजार और राम-सीता सरोवर के नाते बची है। करीब 1040वीं सदी में राजा चेत सिंह का बनवाया गया विजयगढ़ दुर्ग तिलिस्मी है। चंद्रकांता धारावाहिक से ख्याति प्राप्त कर चुके इस तिलिस्मी दुर्ग की खासियत है कि किले के अंदर से गुफा के जरिए नौगढ़ और चुनार गढ़ किले के लिए रास्ता है। यह रास्ता तिलस्म से ही खुलता है। किले का खजाना भी इन्हीं गुफाओं में छिपे होने की संभावना अक्सर लोगों द्वारा जताई जाती है। दुर्ग के ऊपर बने छोटे-बड़े सात तालाब हैं। इनमें रामसरोवर तालाब और सीता तालाब में कभी पानी सूखता। यहां कांवरिये जल भरकर जलाभिषेक करने जाते हैं।  किले के पश्चिम दिशा में मुख्य द्वार है, जो धराशायी हो रहा है।इसकी दीवारें गिर रही हैं। लोगों का कहना है कि जिस तरह से दीवारों का ढहना जारी है उससे कुछ दिनों में इनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। किले के दक्षिण और पूर्व के कोने पर खिड़की का रास्ता है। ज्यादातर लोग इसी रास्ते से किले पर जाते हैं, क्योंकि यह कम ऊंचा है। यहां कुछ सीढ़ियां भी बनी हैैैं लेकिन अधूरी हैं।  जमीन से करीब पांच सौ मीटर ऊंचाई पर बने इस किले के अंदर जो कमरे बने थे वो खंडहर हो गए हैं।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

हनुमान जी गिलहरी स्वरूप में

आपने हनुमान जी के बहुत से मंदिर देखे होंगे। जहां अधिकांश एक जैसी ही प्रतिमा स्थापित होती है लेकिन आज हम एक ऐसे मंदिर के बारे में बताते हैं जहां हनुमान जी गिलहरी स्वरूप में विराजमान हैं।

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अलीगढ़ के प्राचीन प्रसिद्ध अचल सरोवर के किनारे स्थापित श्री गिलहराज जी महाराज का मंदिर विश्व भर में अनोखा है। यहां भगवान हनुमान गिलहरी के रूप में विराजमान हैं। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार के दिन मन्दिर पर भक्तों की सर्वाधिक भीड रहती है। हनुमान जयंती के दिन यहां से हनुमान जी का मेला निकलता है। मान्यता है कि यहां लड्डुओं का भोग लगने से भक्तों के हर संकट दूर हो जाते हैं।

हर बीस मिनट बाद होती है आरती एवं श्रृंगार

विश्व भर में अनोखे गिलहराज जी महाराज के इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां हर बीस मिनट बाद हनुमान जी की आरती होती है। जिससे मंदिर में आने वाले हर भक्त को आरती में शामिल होने का मौका मिलता है।

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लगभग पांच हजार वर्ष पुराना है मंदिर

मंदिर के महंत कौशलनाथ जी बताते हैं कि मंदिर लगभग पांच हजार वर्ष पुराना है। मान्यता है कि श्री गिलहराज जी महाराज के विग्रह रूप की खोज महंत महेंद्र योगी महाराज ने की थी। जो नाथ सम्प्रदाय के परम सिद्ध योगी थे। जिन्हें स्वप्न में श्री हनुमान जी महाराज का साक्षात्कार हुआ था।

द्वापर युग में दाऊजी ने की थी प्रथम पूजा

मान्यता है कि श्री गिलहराज जी महाराज के मंदिर में विराजमान हनुमान जी के गिलहरी रूप की पूजा सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण के भाई दाऊजी महाराज ने की थी। सारे विश्व भर में गिलहरी के रूप में हनुमान यही देखने को मिलते हैं।

चोला चढ़ाने से मिलती है मुक्ति

मान्यता है कि श्री गिलहराज जी महाराज के इस मंदिर में विराजमान हनुमान जी के गिलहरी स्वरुप में जो आकृति है उसके एक हाथ में लड्डू व् चरणों में नवग्रह दबे हुए हैं। इसलिए यहां पर चोला चढ़ाने से नवग्रह से मुक्ति मिलती है। इसलिए गिलहराज जी को ग्रह-नर-राज भी कहा जाता है। जिसका अर्थ ग्रहों को हराने वाला है।

ये है मान्यता

गिलहराज जी महाराज का मंदिर में मौजूद हनुमान जी का गिलहरी स्वरुप उस समय की याद दिलाता है जब वानरों के द्वारा रामसेतु का निर्माण कार्य चल रहा था। तब भगवान हनुमान बड़े बहे पत्थरों से पुल बना रहे थे तभी श्री राम ने कहा कि हनुमान बड़े बड़े पत्थरों से स्वयं पुल बना देंगे तो अन्य देवता जो वानर रूप में मौजूद थे वह इस सेवा से वंचित रह जाएंगे। इसलिए आप विश्राम कर लें प्रभु राम की आज्ञा से हनुमान वहां से गए लेकिन राम कार्य में हनुमान विश्राम नहीं कर सकते थे इसलिए हनुमान गिलहरी का रूप रखकर आये और बालू पर लोट लगाकर बालू के कण छोड़ने का कार्य कराते रहे। लेकिन प्रभु राम ने उन्हें पहचान लिया और उनके गिलहरी स्वरुप को प्यार से अपने हाथ पर बैठकर दुलार किया। आज भी श्री गिलहरी महाराज के शरीर पर जो तीन लकीरें है वह प्रभु श्री राम की उगलियों के निशान के रूप में दिखाई देती हैं।

By Rohit Saxena from Aligarh (U.P.) 202001

Before the Enlightenment

By Suraj Telang from Nagpur(M.S.)

रहस्य और तिलिस्म का  आदिवासी किला

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सोनभद्र- अगोरी किला सोनभद्र ब्‍लाक के चोपन में  स्थित है। यह किला, इस क्षेत्र के मुख्‍य ऐतिहासिक स्‍मारकों और पर्यटन आकर्षणों में से एक है। इतिहासकारों के अनुसार अगोरी किले पर वास्‍तविक अधिकार खारवार शासकों का था, बाद में किले पर चंदेल वंश के शासकों ने आधिपत्‍य जमा लिया। इस किले को आदिवासी किला भी कहा जाता है क्‍योंकि इसके अन्तिम शासक एक आदिवासी राजा ही थे। किले में आज भी वो रहस्य और तिलिस्म दफ़न हैं जिसको न कोई इतिहासकार समझ पाया है और ना ही कोई आम इंसान। जानकार बताते हैं कि इस किले में आज भी अदृश्य शक्तियों का राज हैं, जो किले में मौजूद बेशकीमती खजाने की रक्षा करते हैं। इस किले पास युद्ध में सैकड़ों लोगों की जाने गईं थीं। कहा जाता हैं मरे हुए लोगों की आत्मा आज भी शाम होते मुक्ति के लिए चीखती हैं।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

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By Suraj Telang from Nagpur  (M.S.)

200 साल पुरानी आलीशान इमारत

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बरेली स्थित ऐतिहासिक किला कोठी, जिसे मुगलों द्वारा बनवाया गया था. करीब 200 साल पुरानी इस आलीशान इमारत का रक्तरंजित इस्तेमाल अंग्रेजों द्वारा किया गया, जो इस किले के दरवाजे पर स्वतंत्रता सेनानियों को फाँसी दिया करते थे.

by Syed Raza Rizvi from Bareilly (U.P.) 243003

सृजन मुद्रा में शिव पार्वती

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सोनभद्र-शिव द्वार मंदिर, उत्‍तर प्रदेश के रॉबर्ट्सगंज के पश्चिम में 40 किमी. दूर, शिवद्वार रोड़ पर घोरवाल से 10 किमी. की दूरी पर स्थित है।  यह  मंदिर, भगवान शिव और  पार्वती को समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में शिव पार्वती की 11 वीं सदी की काले पत्‍थर की मूर्ति रखी हुई है। यह तीन फुट ऊंची मूर्ति सृजन मुद्रा में रखी हुई है जो एक रचनात्‍मक मुद्रा है। यह मंदिर उस काल के शिल्‍प कौशल के बेहतरीन नमूने और शानदार कला का प्रदर्शन करता है। यह मंदिर, क्षेत्र के सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक है।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

बाराही धाम देबीधुरा में लगता है पत्थर मार मेला

चंपावत जिले से लगभग 70किमी दूर पाटी तहसील में स्थित है मां भगवती का  मंदिर। वैसे तो देबीधुरा  अपने आप में एक  पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करने वाली जगह है  लेकिन यहां  रक्षाबंधन के दिन लगने यह वाले पत्थर मार युद्ध जिसे देखने  के लिए लाखों लोग यहां आते हैं ने एक अलग पहचान बनाई है।

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भगवती के इस मंदिर में हर बहुत समय पहले से ही यहां पहले सात बकरी ऐक नर भैंसा की बली दी जाती है जिसे अठवार कहा जाता है। उसके बाद रक्षाबंधन के दिन हर साल विशाल मेला लगता है जिसमें सात खाम चार तोक के वीर आपस में पत्थर मार युद्ध खेलते हैं  जिसे बग्वाल कहा जाता है।

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बग्वाल देखने के लिए दूर दूर से लाखों लोग यहां आते हैं। बग्वाल में पत्थर लगने से जो वीर घायल हो जाते हैं उनको  उपचार में बिच्छू घास लगाया जाता है। समय के साथ मेले में भी परिवर्तन आया है अब नर भैंसे की बली और भी किसी प्रकार के जीव की बली हाइकोर्ट के आदेश के बाद नहीं दी जाती है तथा बग्वाल पिछले तीन सालों से पत्थरों से ना खेलकर नाशपाती से खेली जाती है लेकिन बीच में पत्थर ही चलते हैं।

By Subhash Chandra Jukariya from Champawat (U.K.)

कंडाकोट के अर्धनारीश्वर

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सोनभद्र- जिला मुख्यालय से आठ किमी की दूरी पर बहुआर में स्थित कंडाकोट की पहाड़ी पर  भगवान शिव व माता पार्वती की प्रतिमा है। इन्हें गिरिजा शंकर के नाम से जाना जाता है।

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ऐसी मान्यता है कि यहीं पर कण्व ऋषि की तपोस्थली है। यहां के पहाड़ में दो ऐसी गुफाएं हैं जहां हजारों साल पुराने भित्ति चित्र बने हैं। सबसे पुरानी चित्रकला में बने विभिन्न तरह के चित्र यहां पहुंचने वाले लोगों के लिए आकर्षण के केंद्र होते हैं।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

मां ज्वालामुखी मंदिर की महिमा

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सोनभद्र- शारदीय नवरात्र मे जहां देशभर के श्रृद्धालु वैष्णो देवी धाम  से लेकर सभी शक्ति पीठो मे के दर्शन कर पूजा पाठ करते है वही शक्ति नगर सोनभद्र मे विराजमान ज्वालामुखी की महिमा भी अपार है। नवरात्र की शुरू आत प्रति पदा से लेकर सप्तमी तक रोजाना भोर से ही भक्तो का तांता मंदिर परिसर मे लगती है। इतिहासकारो के अनुसार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड. व बिहार पांच प्रदेशो की सीमा पृ स्थित मां ज्वालामुखी मंदिर रिहन्द जलाशय मे समाहित गहरवार राजा उदित नारायण के राज घराने की कुल देवी के रूप मे उनके द्बारा स्थापित की गई थी। आज भी सिगरौली जिले मे रह रहे इस राजघरानों के लोग माँ ज्वालामुखी को कुल देवी के रूप मे पूजा करते है।

महुअरिया के जंगल में

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सोनभद्र- सोनभद्र के  प्रतिबंधित कैमूर वन्य जीव विहार क्षेत्र महुअरिया के जंगल में ब्लैक बक (काले हिरन) पाये जाते है। यह पर चकारा,  नीलगाय व  भालू भी पाये जाते है।

पर्यटकों को आकर्षित करता है मुक्खा

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सोनभद्र  का मुक्खा झरना, रॉबर्ट्सगंज – घोरवाल – मुखदारी सड़क पर स्थित है । जहा पहाडियों के बीच झरने प्राकृतिक नज़ारे जो देखते ही बनते है। यह फाल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहाँ पर्यटकों का काफी आना जाना रहता है। यहाँ की दुर्गम पहाड़िया, पहाड़ो से गिरते झरने जो प्रकति ने जैसे अपने हाथो से बनाया हो। यह एक बहुत खूबसूरत वाॅटर फाॅल जहाँ से आपका वापस जाने का मन नही करेगा।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

 

अभिशप्त सौंदर्य

चंपावत जिले का गाँव खेतीखान, पहाड़ी सौंदर्य की एक जीती-जागती मिसाल है. यह सौंदर्य उस समय और बढ़ जाता है, जब बरसात के मौसम में आकाश यहाँ के पहाड़ों का जल से श्रंगार करता है. लेकिन, इस सौंदर्य के भीतर एक दर्द भी है, जिसे सहना खेतीखान की नियति बन चुका है.

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चंपावत जिले का अधीकतर हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र में आता है और हमारे गांव में कुछ कारणों पर लोग अक्सर बातें करते हैं हालांकि में इसको बुरी बात नहीं कह सकता क्योंकि से गांव की समस्याओं के बारे में बात होती है। हमारा गांव वैसे तो और गाँव की तरह ही साधारण है। गांव प्राकृतिक तौर बहुत सुंदर है।

गांव का सही से विकास नही हो पाया है विकास का आशय गांव में मूलभूत आवश्यकताओं की कमी है। बच्चों को विद्यालय के लिए 7से10किमी दूरी तय करती ऐसा ही स्वास्थ्य शुविधा का हाल है। गांव में रोजगार के साधनों का अभाव है जिस कारण गांव के लोग पलायन करने को मजबूर हैं। जिस कारण गांव खाली होता जा रहा है। गांव में फलों में नाशपाती, सेब शब्जी में आलू, प्याज, टमाटर, बैगन का उत्पादन भरपूर मात्रा में होता था लेकिन आज स्थिति प्रति कूल हैं। जंगली जानवर खेती को नष्ट कर जा रहे हैं। बारिश ना होने के कारण आज खेती करना मुश्किल हो रहा है जिस कारण लोग पलायन करने को मजबूर हैं। लोगों के पलायन के कारण अधिकतर भूमि बंजर हो रही है।

By Subhash Chandra Jakuriya from Khetikhan, Champawat (U.K.)

सलखन जीवाश्‍म पार्क

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सोनभद्र का सलखन जीवाश्‍म पार्क, सोनभद्र  जिले के कैमुर वन्‍यजीव अभयारण्‍य के अंदर स्थित है।  यह पार्क, सोनभद्र जिले की भू- वैज्ञानिक विरासत का प्रतिनिधित्‍व करता है। पेड़ जीवाश्‍म, वास्‍तव में, पेड़ स्‍टंप में कार्बनिक पदार्थ, पेट्रीफाइड या कॉन्‍क्रिटाइज्‍ड रूप में पाएं जाते है। इस क्षेत्र में सर्कुलर स्‍टोनी फॉरमेशन ( परिपत्र पथरीले संरचनाओं ) पर शैवाल या स्‍ट्रॉमोटोलाइट्स प्रकार के जीवाश्‍म पाएं जाते है।  भूवैज्ञानिकों के अनुसार, यह पेड़ के जीवाश्‍म लगभग 1400 मिलियन साल पुराने है और प्रोटेरोज़ोइक काल के हैं। यह पार्क 25 हेक्‍टेयर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

वीर राजा लोरिक के शौर्य का प्रतीक शिलाखंड

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सोनभद्र- राबर्ट्सगंज से शक्तिनगर मुख्यमार्ग पर मात्र 6 किमी दूरी पर स्थित है वीर लोरिक पत्थर, एक विशालकाय दो टुकड़ो में खंडित पत्थर, जिस पत्थर को यादवों के वीर अहीर राजा लोरिक ने तलवार के एक ही प्रहार से विभक्त कर दिया था, जो सहज ही यात्रियों – पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है और इसके इतिहासकारों के अनुसार अगोरी के राजा मोलागत के अधीन ही महरा (मेहर) नाम का अहीर रहता था | महरा की ही आख़िरी सातवीं संतान थी मंजरी | जो अत्यंत ही सुन्दर थी | जिस पर मोलागत की बुरी नजर पडी थी और वह उसे महल में ले जाने का दबाव डाल रहा था। इसी दौरान मंजरी के पिता महरा को लोरिक के बारे में जानकारी हुई और मंजरी की शादी लोरिक से तय कर दी गयी । वीर अहीर लोरिक बलिया जनपद के गौरा गाँव के निवासी थे, जो बहुत ही बहादुर और बलशाली थे | युद्ध में वे अकेले हज़ारो के बराबर थे। मंजरी की विदाई के बाद डोली मारकुंडी पहाडी पर पहुँचने पर नवविवाहिता मंजरी लोरिक के अपार बल को एक बार और देखने के लिए चुनौती देती है और कहती है कि कि कुछ ऐसा करो जिससे यहां के लोग याद रखें कि लोरिक और मंजरी कभी किस हद तक प्यार करते थे। लोरिक कहता है कि बताओ ऐसा क्या करूं जो हमारे प्यार की अमर निशानी बने ही, प्यार करने वाला कोई भी जोड़ा यहां से मायूस भी न लौटे। मंजरी लोरिक को एक पत्थर दिखाते हुए कहती है कि वे अपने प्रिय हथियार से एक विशाल शिलाखंड को एक ही वार में दो भागो में विभक्त कर दें – लोरिक ने ऐसा ही किया और अपनी प्रेम -परीक्षा में पास हो गए |
यह खंडित शिला आज उसी अखंड प्रेम की जीवंत कथा कहती प्रतीत होती है | मंजरी ने खंडित शिला को अपने मांग का सिन्दूर भी लगाया। यहाँ हर साल गोवर्द्धन पूजा और अन्य अवसरों पर मेला लगता है -लोग कहते हैं कि कुछ अवसरों पर शिला का सिन्दूर चमकता है ।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

समाप्त होने की तरफ हैं घाराट

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चंपावत (07/10):  पहाड़ी क्षेत्रों में पहले चक्यिां ना हो कर घराट होते थे ।जिनको यहां की भाषा में (घट )कहा जाता था। जो गेहूं पीसने के काम आते थे।जहां पर तेज पानी का बहाव होता नदिंयों के किनारे या नदिंयों से गूल बनाकर पानी घराटों तक पहुंचाया जाता था जिसको घराट में लगे  पंखों में गिराया जाता है जिससे जितनी तेजी से पानी गिरता था उतनी तेजी से ही फर (पंख)जो लकडी के बने होते थे घूमते हैं,और इतनी तेजी से ही,उसमें लगी पत्थर की चक्कियां घूमते हैं जिस कारण एक तकनीकि के माध्यम से ऊपर से गेहूं के दाने गिराये जाते हैं और गेहूं पिसा जाता है। लोग  कुछ समय पहले तक पूरी रात भर जागरण करते हुए धराटों में गेहूं पिसाई का कार्य करते थे, और सुबह के समय ही घर जाते थे ।यह घराट बिल्कुल स्वदेशी होते थे।घराटों में पिसा हुआ गेहूं का आटा शुद्ध और पौस्टिक माना जाता है। धराटों में साफ सफाई का बहुत ध्यान रखा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे चक्कियां आने से घराटों का अस्तित्व समाप्ति की ओर हो गया है ।घराट अब पहाड़ी क्षेत्र के दूरदराज के गांव में कहीं-कहीं पर ही देखने को मिलते हैं जहां पर अभी भी बिजली की व्यवस्था नहीं है या फिर जहां चक्कियों  नहीं हैं।तो वहां पर अभी भी गेहों पिसाई का काम घराटों के माध्यम से ही किया जाता है ।सरकारों  और जनप्रतिनिधियों को भी चाहिए कि हमारी पुरानी विरासत घराटों को  पुनः जीवित करने के प्रयास करते हुए इनको बचाने के बारे में सोचा जाए।

By Subhash Chandra Jukariya  from  Champawat (U.K.)

 

 

 

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