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पीलीभीत एक्सप्रेस: दरगाह हजरत सैयद शाह कादिर कुमैसुल आजम

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दरगाह हजरत सैयद शाह कादिर कुमैसुल आजम 

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पीलीभीत (20/10): हजरत सैयद शाह कादिर कुमैसुल आजम साढौरा की याद में होने वाला उर्स सांप्रदायिक सद्भावना, एकता एवं भाईचारे की मसाल कायम किए हुए है। साढौरा नदी पार स्थित इस महान संत की मजार पर लगने वाले सालाना मेले में उतर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, हैदराबाद, कोलकता, तथा पाकिस्तान से लाखों की संख्या में श्रद्घालु पहुंचते हैं। मेले की तिथि के बारे में आश्चर्यजनक बात यह है कि प्रत्येक मेला अगले वर्ष दस दिन पहले मनाया जाता है इस प्रकार यह मेला 36 साल बाद पुन: उसी तिथि में आ जाता है! इस महान संत की यहां स्थित दरगाह को कादरी संप्रदाय की हिन्दुस्तान की पहली व अविभाजित पंजाब की सबसे बड़ी गद्दी होने का गौरव प्राप्त है। अब्दुल हयात कादरी की ओर से लिखित पुस्तक के अनुसार उनका जन्म हिजरी संवत् 921 में बंगाल प्रांत में हुआ। इन्होंने अपने जीवन काल में सांप्रदायिक सौहार्द पैदा करने के अनेकों प्रयास किए। इनके पूर्वज बगदाद में रहते थे जहां से पीरों के पीर गौसे आजम दस्तगीर बगदाद वालों के रूहानी आदेशों पर उन्होंने बंगाल को अपनी कर्मस्थली बना लिया। संप्रदाय सौहार्द कायम की भावना को मन में लिए हजरत शाह बंगाल से सराय अफगान, लखनऊ एवं गंगोह होते हुए साढौरा पहुंचे तथा यहां स्थित नूर मोहम्मद की दरगाह में पहुंच कर डेरा डाल लिया। एक शाम नमाज अदा करने के लिए वजू के लिए समीप के कुएं पर गए मगर कुआं सूखा पड़ा था उनके फरियाद करने पर सूखे कुएं में पानी आ गया। नूर शहीद की दरगाह के उत्तर में नकटी नदी के दूसरे छोर पर बरसों से वीरान पड़ी कुमैसी मस्जिद में आकर इन्होंने नमाज अदा की। इस मस्जिद के समीप ही इस महान संत की मजार स्थित है जहां प्रति वर्ष लाखों की संख्या में हिंदू सिख एवं मुस्लिम श्रद्घालु समान रूप से यहां आते हैं। हिजरी संवत् 1001 में इस महान विलक्षण सूफी संत के निधन के पश्चात से उनकी दरगाह पर लगाने वाला सालाना उर्स वर्षो से इस क्षेत्र में सम्प्रदाय एकता की मिसाल बन चुका है। रोजा पीर दरगाह के गद्दी नशीन पीरजादा सैयद अब्दुल कयूम कुमैसुल कादरी ने बताया कि पीरों के पीर गौसे आजम दस्तगीर बगदाद वाले 11वीं के महीने के चांद की नौ एवं दस को पैगम्बर के नाम पर लंगर लगाया करते थे। तभी से लेकर आज तक कादरी संप्रदाय के लोग अपने पूर्वजों की याद में उर्स आयोजित करते आ रहे है। पीर की मजार पर मेला तीन दिन चलता है। मेले के प्रारंभ के विषय में कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह मेला सर्वप्रथम अकबर के संरक्षक बैरम खान ने 1556 में प्रारंभ करवाया था इस मेले की सफल व्यवस्था में समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। मेले के दौरान साढौरा नदी में दंगल का विशेष आयोजन किया जाता है। जिसमें आसपास एवं दूरदराज के नामी पहलवान भाग लेते है। गद्दी नशीन अब्दुल कयूम ने बताया कि दूर दराज से आए श्रद्घालुओं के ठहरने के लिए दरगाह परिसर में वैसे तो आवासीय कमरों का निर्माण करवाया गया है। बाहर से आए श्रद्घालु साढौरा बाजार में यहां की मशहूर मेंहदी खरीदने में कभी भी भूल नहीं करते।

हाजी वारिस अली शाह की दरगाह

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पीलीभीत (17/10): उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में देवा शरीफ, के बारे में बहुत अधिक लोग नहीं जानते, लेकिन शांति, सहिष्णुता और सौहार्द की प्रतीक इस दरगाह पर सदियों से लोगों का आना जारी है, जिनमें सभी धर्मों में आस्था रखने वाले लोग शामिल हैं।
लखनऊ से एक घंटे की दूरी पर स्थित हाजी वारिस अली शाह की दरगाह देवा शरीफ का वातावरण बहुत शांत और अपनेपन का अहसास कराता है। लोग फूलों, मिठाइयों और रंग-बिरंगी चादरों के साथ इस सूफी संत की दरगाह पर आते हैं। इस दरगाह की खास बात यह है कि इसकी नींव कन्हैया लाल नामक एक हिन्दू ने रखी थी।
ऐसा कहा जाता है कि, हाजी वारिस अली शाह ने अपने अनुयायियों को कभी भी अपना धर्म छोड़ने को नहीं कहा और यही वजह है कि, आज यहां हिंदू और मुस्लिम बराबर की संख्या में आते हैं। यहां पर मुसाफिरो के ठहरने के लिए उचित व्यवस्था है, जहाँ दूर दराज से लोग आकर अपनी रात गुजारते हैं. इसके अलावा उनके खाने की भी उचित व्यवस्था होती हैं!

हजरत हाजी वारिस अली शाह

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19वीं शताब्दी का महान सूफी संत थे उन्होंने पैर पर कई बार हज का प्रदर्शन किया और हमेशा अपने जीवन में इहराम लिवास हाजी वारिस पाक के इहराम का रंग पीला था जो आज भी उनकी आल के लोग यही पीला रंग के इहराम मे रहते हैं हाजी वारिस पाक के जीवन के आध्यात्मिक और तपस्वी तरीके के लिए एक आदर्श उदाहरण है।
उनका जन्म हुसैनि सिड्स के परिवार में हुआ था, जो पवित्रता और सीखने के लिए प्रतिष्ठित थे। उनकी वंशावली से पता चलता है कि उनका जन्म 26 वीं पीढ़ी हजरत इमाम हुसैन में हुआ था। उनके जन्म की तारीख 1233 से 1238 तक अलग-अलग विवादित है। मार्फिफ वारिस्या के लेखक ने 1234 के रूप में अपने जन्म की तारीख को ईसाई युग के 1809 के अनुरूप रखा है। उनके पिता, सैयद कब्रन अली शाह एक लैंडेड क्लास के थे और बगदाद में अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए काफी सीखने वाले व्यक्ति थे।

हाजी वारिस अली शाह ने दो साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया और तीन साल की उम्र में अपनी मां की देखभाल की। उनकी भव्य मां जानबा हैथुनिसा साहेबा ने उन्हें ध्यान से लाने का कर्तव्य संभाला। एक शिशु के रूप में, अन्य बच्चों के विपरीत वह जल्दी से अपना दूध नहीं पीएगेँ बल्कि धीरे-धीरे और धीरे-धीरे पीएगें। उसकी प्यास केवल कुछ गुलप्स के साथ बुझा दी जाएगी, जिसने अपने भविष्य के धैर्य और संतुष्टि के गुणों को इंगित किया था।

देवा शरीफ की महिलाएं बच्चे के महान व्यवहार पर भी आश्चर्यचकित थीं और व्यक्त किया कि इस तरह का एक अद्भुत बच्चा शायद ही कभी देखा जा सके; अन्य बच्चों के विपरीत उसका सोने का बिस्तर हमेशा साफ था। अन्य बच्चों के विपरीत उन्होंने कभी रोया नहीं लेकिन ज्यादातर चुप थे। जब भी वह प्रकृति की कॉल का जवाब देने का आग्रह करते थे तो उसने अजीब संकेत निर्माता की कलाकृति की सराहना करने के लिए। वह बहुत कम सोता थे, लेकिन वह हमेशा मुस्कुराते हुए चेहरे से जागता थे अत्याधुनिक बच्चे की वही और शांत गतिविधि का साक्षी करते हुए, देवा शरीफ के बुजुर्ग लोग सम्मान करते हैं और उन्हें उच्च सम्मान में रखते हैं।

जैसे-जैसे बच्चा बढ़ने लगा, उसकी आदतें गरिमा और आजादी का झुकाव मानी गईं। पांच साल की उम्र में उनकी दादी ने अपनी शिक्षा शुरू करने के लिए एक उपयुक्त प्रशिक्षक लगाया उनकी जीवन शैली: उनकी जीवन शैली सरल थी, उन्होंने सामान्य भोजन खाया और हमेशा चलना पसंद किया। उसका खाना सरल था और उसने स्वादिष्ट व्यंजनों को नापसंद किया। उन्होंने 14 साल की उम्र से उपवास शुरू किया और सप्ताह में एक बार उपवास तोड़ने के लिए उपयोग किया। उन्हें पीले रंग में पोशाक पसंद आया और उनकी पोशाक एक साधारण दो टुकड़ा कपड़ा (एहराम) थी। उन्होंने अमीर और गरीबों के बीच अपनी भव्य उपस्थिति से उनके निमंत्रण का सम्मान करने के लिए कोई भेद नहीं किया। सरकार वारिस की आदत बहुत कम खाना थी, फिर भी उनके भक्तों ने बहुत सारे प्रयास और प्यार के साथ व्यंजन तैयार किए थे, इसलिए सरकार वारिस केवल अपने हाथ को छूने का स्वाद लेगा ताकि उन्हें निराश न किया जा सके।
सरकार वारिस पाक ने इतनी हद तक स्वाद की भावना खो दी कि सरकार ने अपनी उंगली को मिठाई में डुबोकर टिप्पणी की, “दला ठीक हो गया है”। इसके अलावा, चावल के कुछ अनाज चखने का कहना है, “पकाना बहुत कुशल है’

By Mohd. Kaleem from Amariya , Pilibhit (U.P.) 262121

1769 में बनी जामा मस्जिद 

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पीलीभीत (11/10): मुगल काल मे कई बड़ी इमारतों का निर्माण किया गया था। जामा मस्जिद, दिल्ली की तर्ज 1769 में हफीज रहमत खान द्वारा पीलीभीत में बनाई गई थी। इससे पहले इस जगह एक तालाब था। उस समय इस मस्जिद के निर्माण के लिए तीन लाख रुपये खर्च किए गए थे। जामा मस्जिद में अभी भी एक धूप की घड़ी है। हाफिज रहमत खान अफगान रोहिल्ला नेता थे जिनकी जागिरियों या संपत्तियों में पीलीभीत और बरेली शामिल थे, जहां उन्हें दफनाया गया था। वह पश्चिमी अवध में रोहिला अफगानों के नेता बने, लेकिन 1774 में ब्रिटिश सेनाओं द्वारा सहायता प्राप्त अवध के नवाब के खिलाफ एक लड़ाई में मारे गए। गेटवे मुगल शैली में बनाया गया है, जामा मस्जिद के प्रवेश द्वार पर श्रद्धांजलि अर्पित दिल्ली, जबकि मस्जिद के घेरे के चारों ओर की दीवार आगरा में मुगल महल में शाहजहां के जोड़ों में पाए गए बंगाली छत को दिखाती है। हर शुक्रवार, शहर और आसपास के गांवों की बड़ी मुस्लिम आबादी मस्जिद में आती है और जमैत में प्रार्थना करती है। इस मस्जिद के रखरखाव कमी होने के कारण व आसपास घने आबादी के कारण, इमारत का हिस्सा नष्ट कर दिया गया है और भूमि का हिस्सा बनाया गया है। जामा मस्जिद परिसर में हर मंगलवार को एक छोटा सा बाजार भी आयोजित किया जाता है। एक महान तहसील यौगिक भी महान जामा मस्जिद परिसर के पास आया है।यह मस्जिद पीलीभीत की शान है तथा यह मस्जिद हाफ़िज रहमत खान साहब की लोगों हमेशा याद दिलाती है और यह मस्जिद दिल्ली की जामा मस्जिद नक्शा वयाँ करती है.

By Mohd. Kaleem from Amariya , Pilibhit (U.P.) 262121

मासूम अली सरवर आई ए एस अधिकारी के हस्ताक्षर की होगी जांच ?

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पीलीभीत (06/10): तहसील अमरिया के मुलईया गांव में वक्फ बोर्ड की 430 एकड़ जमीन को तत्कालीन जिलाधिकारी के कथित फर्जी हस्ताक्षर कर हड़पने के मामले एक साल बीतने के बाद कुछ तेज़ी आयी है। उक्त प्रकरण में अब तक जांच कागज़ों तक ही सीमित थी, लेकिन अब कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए क्राइम ब्रांच की टीम हस्ताक्षर की सत्यता का पता लगाने का प्रयास कर रही है। इसके लिए तत्कालीन डीएम मासूम अली सरवर के हस्ताक्षर का नमूना लेकर उसका एक्सपर्ट से मिलान कराया जाएगा।तहसील अमरिया के गांव फुलईया में वक्फ बोर्ड की करीब 430 एकड़ भूमि है, जिस पर पर कुछ सिख परिवार लम्बे समय से काबिज हैं। आरोप था कि मई 2017 में यह जमीन तत्कालीन डीएम मासूम अली सरवर के फर्जी हस्ताक्षर कर तसलीम हसन खान ने खुद को वक्फ बोर्ड का प्रबंधक दर्शाकर अपने नाम पर दर्ज करा ली थी। डीएम मासूम अली सरवर के तबादले के बाद जब तत्कालीन डीएम शीतल वर्मा के संज्ञान में मामला आया तो उन्होंने इस मामले में सख्ती की। इसके बाद डीएम शीतल वर्मा ने मासूम अली सरवर से जब फोन पर बात कर पूछा तो उन्होंने ऐसे किसी भी दस्तावेज़ पर अपने हस्ताक्षर होने से इंकार कर दिया। इसके बाद डीएम शीतल वर्मा के निर्देश पर जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी देवेंद्र कुमार की तहरीर पर कोतवाली सदर में अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मई 2017 में मुकदमा दर्ज कराया था।जांच के दौरान अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के एक लिपिक का नाम भी बतौर आरोपी सामने आया था। लेकिन अब उसकी मृत्यु हो चुकी है। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने मुकदमे की विवेचना क्राइम ब्रांच को सौंपी थी, जिसमें एक साल से अधिक समय बीतने के बाद भी इस मामले को लेकर कुछ स्पष्ट नहीं हो सका, न ही आरोपियों पर शिकंजा कसा जा सका।पुलिस अधीक्षक बालेन्दु भूषण सिंह ने क्राइम ब्रांच को सख्ती से आदेश दिये हैं कि विवेचना जल्द पूरी की जाये और आईएएस मासूम अली सरवर के हस्ताक्षरों का नमूना लेकर एक्सपर्ट से मिलान कराया जाये। हस्ताक्षर का नमूना लेने के लिए क्राइम ब्रांच के एसआई मेराज अली को भेजा गया है। एक्सपर्ट की रिपोर्ट आने के बाद पुलिस दोषियों पर शिकंजा कसेगी।

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बच्चे का अपहरण, वैन छोड़कर भागे अपहरणकर्ता

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पीलीभीत (03/10):चन्दोई निवासी फिरोज मलिक के बेटे हमजा फिरोज (13 वर्ष) का पीलीभीत उत्तर प्रदेश खकरा पुल से सिल्वर कलर की वैन पर सवार चार नकाबपोश बदमाशों ने अपहरण कर लिया. अपहरणकर्ता नकाबपोश नकटादाना होते हुए वैन को रेलवे स्टेशन माल गोदाम के पास खड़ा कर के बच्चे को अन्दर बन्द कर बाहर चले गये। बच्चे की मदद की गुहार पर राहगीरों ने शीशा तोड़ कर उसे बाहर निकाला। बच्चे के सम्पर्क में आते ही घर वाले घटना स्थल पर दौड़े तो वहां से वैन नदारद थी लेकिन उसके शीशे नीचे पड़े थे। व्यापार मण्डल के जिला अध्यक्ष मो० अफरोज जिलानी पीड़ित परिवार को लेकर फौरन कोतवाली पहुंचे जहां पर एसपी साहब और सीओ सिटी ने मामले को गंभीरता से लिया और पूर्ण मदद का आश्वासन दिया।

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हादसों को दावत देता क्षतिग्रस्त पुल

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पीलीभीत (02/10): अँग्रजां के समय बना यह पुल पौटा डैम आमरिया तहसील में है.यह एक ऐसा रास्ता है, जहाँ से होकर हर रोज कई स्कूली वाहन बच्चों के साथ जान जोखिम में डालकर निकल रहे हैं पर प्रशासन ने अब तक न ही कोई बोर्ड लगाया है, न ही कोई मरम्मत कार्य शुरू किया है. लगातार लोग इस खतरे का सामना करने पर मजबूर हैं, जबकि प्रशासन शान्त बैठा शायद किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है.

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